World animal day‌ : इंसाफ के इंतजार में जान गंवा रहे बेजुबान, पशु क्रूरता अधिनियम का सख्ती से नहीं होता पालन

कई-कई सालों तक नहीं होती कोई कार्रवाई, दफ्तरों ने धूल फांक रही पशु क्रूरता अधिनियम की फाइल

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Meerut: देश में सिर्फ इंसान ही नहीं, बल्कि पशु भी इसांफ  के इंतजार में बूढे होकर दुनिया को अलविदा कह जाते हैं। जी हां बेजुबानों के लिए बने कानून को शासन-प्रशासन आज भी ठीक से अमल नहीं कर सका है। यही वजह है कि पशु क्रूरता अधिनियम में जिन मुल्जिमों को पुलिस गिरफ्तार कर जेल भेजती है, उन्हें सजा नहीं मिल पाती है। जमानत मिलने के बाद ये मुल्जिम कोर्ट में पेश ही नहीं होते। वारंट जारी होने के बाद भी गिरफ्तारी नहीं होती। ऐसे 204 से अधिक मामले हैं, जिनमें लगभग 450 मुल्जिम पांच साल से फरार हैं। जमानतदारों के भी वारंट जारी हो चुके हैं। वे भी हाजिर नहीं हो रहे। ऐसा सिर्फ मेरठ ही नहीं बल्कि ठीक से जांच की जाए तो पूरे देश में लाखों केस ऐसे होंगे, जो एक्टीव तो हैं, लेकिन पेंडिंग के से बुरी हालत में हैं।

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पशु क्रूरता संबंधी फाइलें अधिकारियों के दफ्तर में फाइलों के नीचे दब जाती हैं। इन फाइलों को देखने की अधिकारियों के पास फुर्शत नहीं होती। जिसके चलते बेजुबान बूढे होकर अपनी जन से चले जाते हैं, लेकिन इंसाफ नहीं मिल पाता।अकेले  मेरठ में  लगभग 200 से ज्यादा मामले लंबित पड़े हैं। साथ ही इतने ही मामलों में वारंट होने के बाद भी अपराधियों की गिरफ्तारी नहीं हो रही है। जमानती भी चैन की नींद सो रहे हैं, उन्हे कोई पूछने वाला तक नहीं है।

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फर्जी होते हैं जमानती

विशेषज्ञ अधिवक्ता अतुल कुमार  के अनुसार पशु क्रूरता अधिनियम में ज्यादातर जमानती फर्जी होते हैं। जो अपराधियों को जमानत पर छुड़ा तो लेते हैं, इसके बाद उन्हे ढूंढ पाना पुलिस के लिए टेढ़ी खीर होती है। अकेले मेरठ जनपद में ऐसे जमानतियों की संख्या 500 के पार होगी, जिनकी जमानत पर पशु क्रूरता अधिनियम के तहत अपराधी को जमानत मिल चुकी है। लेकिन अपराधी और जमानती दोनों ही फरार है। पुलिस और प्रशासन उन्हे गिरफ्तार करने की जहमत तक नहीं उठा रहा है। अधिवक्ता राजकुमार ने बताया कि पशु क्रुरता अधिनियम के मामलों को न तो विभाग और न ही कोर्ट दोनों ही संजिदा नहीं होते। जिसके चलते दोषी जुर्म करने के बाद भी चैन की नींद सोते हैं।

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