बादलों ने तरसाया ज्यादा बरसे कम, धान के किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें

मौसम वैज्ञानिकों का मानना मानसून अब केवल 15 दिनों का ही मेहमान

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Meerut। इस बार दूसरे राज्यों या पूर्वी उत्तर प्रदेश को छोड़ दें तो वेस्ट यूपी के लिए बदरा पूरी तरह बेवफा साबित हुए हैं। मानसूनी सत्र में बादलों ने तरसाया तो खूब, लेकिन बरसने में कंजूसी कर गए। इस बार औसत से भी कम बारिश हूई है। अब जब कुल 15 दिनों का ही मानसून बचा है, तब मौसम वैज्ञानिकों को थोड़ी-बहुत उम्मीद जरुर है। बारिश की बेरुखी देखकर वेस्ट यूपी के धान किसानों के माथे पर चिंता के बल पड़ने लगे हैं। यदि बारिश नहीं हुई तो धान किसानों को अच्छा-खासा नुकसान झेलना पड़ सकता है।
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इस बार वैसे ही corona के चलते हर वर्ग मंदी की मार से गुजर रहा है। किसानों का शुगर मिलों ने गन्ने का पैमेंट नहीं दिया है। किसानों को थोड़ी-बहुत आस धान से थी। जिसका खेल बारिश ने बिगाड़ दिया किसान का मानना है कि यदि अच्छी बारिश नहीं होती है तो धान की उत्पादक क्षमता आधे से भी कम रह जाएगी। मौसम वैज्ञानिक बताते हैं कि वेस्ट यूपी में मानसून सीजन में करीब 600 मिमी बारिश हो जानी चाहिए, जबकि मेरठ में यह आंकड़ा 500 मिमी के आसपास का है। इसके मुकाबले इन तीन माह में वेस्ट में जहां 375 मिमी और मेरठ में 277 मिमी ही बारिश रिकार्ड की गई। यानि वेस्ट यूपी में करीब 38 प्रतिशत और मेरठ में 41 प्रतिशत कम बारिश हुई है, जिसकी भरपाई कर पाना किसान के लिए मुश्किल साबित हो सकता है।

खूब रहा आसमान नीला

इस सीजन में कहीं-कहीं बारिश हुई तो अधिकांश जगह सूखा रहा। आसमान पर काली घटाएं खूब छाई, लेकिन बरसात के नाम पर सभी को निराशा हाथ लगी। गुरुवार को भी इस तरह का मौसम रहा, दिनभर बादलों के बीच कहीं को थोड़ी-बहुत बारिश हुई तो कहीं को बदरा ऐसे ही चले गए। दिनभर बादलों और धूप के बीच लुकाछिपी का खेल चलता रहा। मौसम विभाग पर अधिकतम तापमान 33 प्वाइंट 9 और न्यूनतम तापमान 24 प्वाइंट 6 डिग्री सेल्सियस रिकार्ड किया गया।

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क्या हैं कम बारिश को नुकसान

  • धान की उत्पादक क्षमता कम हो जाती है
  • गन्ने में भी वजन कम निकलने के चांस रहते हैं
  • मौसमी बीमारी जैसे मलेरिया, डायरिया आदि ज्यादा फैलती हैं
  • कमजोर मानसून से सर्दी के सीजन में भी बारिश नहीं होती
  • अन्य फसलों का भी विकास बारिश की वजह से बाधित हो जाता है
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